अधूरी अभिलाषा's image
116K

अधूरी अभिलाषा

जानता नहीं मैं

ढूढ़ते है किसको मेरे नयन

इन पथों पर टिकते नहीं एक जगह मेरे पांव

ठहरता ही नहीं एक जगह मेरा मन।

क्या है मेरे अंतर की धरा उर्वरा,

जहां भावों के न जाने कितने

बीज होते हैं अंकुरित

पल्लवित होते कितने गीतों के सुमन।

शब्दों में करता जो प्रतिबिंबित

मैं अनगिनत भावनाएं

कुछ सुख,कुछ दुख कुछ वेदनाएं

क्या कुछ कुछ झलक 

उनमें अपनी हर कोई पाए ।

छुपकर न जाने क्यों

मैं आवरणों में रहता हूं

क्या पता किससे मैं बोलता हूं 

किससे मैं क्या कहता हूं,

कौन मुझे सुनता है

कौन मुझसे कहता है,

<
Read More! Earn More! Learn More!