कहाँ गये खेल वह। ढूँढते फिरते थे एक दूसरे को, आसपाई- धप्पा करते थे। कहाँ गये खेल वह?   कहाँ गये खेल वह। रोज शाम आम के नीचे, कच्चे आम तोड़ कर लाते थे। कहाँ गये गुलेल वह ?   कहाँ गये खेल वह। एक दूसरे के कंधे पकड़ कर, हाॅर्न बजाकर चलते थे। कहाँ गई बचपन की रेल वह?   कहाँ गये खेल वह। मिट्टी से सृजन करते, ट्रैक्टर और पुतले बनाते थे। कहाँ गये खेल वह?   कहाँ गये खेल वह। निशाना लगाने में तो माहिर थे, किल्ली डण्डा साथ लिए फिरते थे। कहाँ गये खेल वह?   कहाँ गये खेल वह। जेबें खनकती थीं कंचो से, घोड़ा-घिस्सा किया करते थे। कहाँ गये खेल वह?   कहाँ गये खेल वह। माचिस के टिक्कों को जीतकर, खुद को धनी समझते थे। कहाँ गये खेल वह?   कहाँ गये खेल वह। धनुष बाण बनाकर, कभी राम कभी लक्ष्मण बन जाते  थे। कहाँ गये खेल वह?   कहाँ गये खेल वह। दीवाली को रात में खूब पटाखे फोड़कर, सुबह बचे पटाखे ढूँढने गलियों में निकल जाते थे। कहाँ गये खेल वह?   कहाँ गये खेल वह। होली पर भी रंगो से कम, दोस्तों को पानी से ज्यादा भिगाते थे। कहाँ गये खेल वह?   कहाँ गये खेल वह। खेतों में कचरिया ढूँढने जाते थे, पकी मिल जाती तो फूले नहीं समांते थे। कहाँ गये खेल वह?   कहाँ गये खेल वह। भूल रहे हैं वो लगड़ीं यादें, जब लगड़ीं खेलते हुए लगड़ांते थे। कहाँ गये खेल वह?