याद बोहोत आती है,
अब चलो गाव मेरे यार......

देखना है वो झरना,
जिसमे तैरता कोई अपना...

और वो मंदिर का चौराहा,
जहा शिवजी का है रहना...

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सुहाना होता था हर सवेरा,
जब मुर्गा बनके घडी देता था बाँघ का सहारा...

काम सुबह था अपना बस एक,
खेलने दौडो लेके दोस्त अनेक...

खाना खाता एक घर पाणी पीता दुसरे,
हर घर अपना और कान्हा मैं सबका खास रे...

कोई देता सेव तो कोई मख्खन देता ताजा,
कभी भी आओ कभी भी जाओ दिल से थे सब राजा...

घुमना आज फिर हर घर है,
बस इसिलिये भाईसा चलो गांव मेरे यार......

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दोपहर का समय कोई भुलता भला कैसे,
आता था कुल्फीवाला लेके साथ कुल्फी हिमालय जैसे...

माँये लडाती थी कई गप्पे,
बच्चे खेलते चप्पे चप्पे...

बुढे बैठे होते फुकते हुए बिडी,
बच्चों की भी चलती थी अपनी सांपसिडी...

देखना इन आँखों से आज फिर वो दिन है, बस इसिलिये भाईसा चलो गांव मेरे यार......

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शाम के वक्त सुनेहरा हर समा होता था,
सूरज डुबता था तो चंदा मामा उगता था...

किसान भी तब घर को आते,
खेत से जैसे जत्थे आते...

माथे पे पसीने की होती थी चमकान,
पर चेहरे पर होती थी सोने सी मुस्कान...

पुछना आज उस मुस्कान का राज है,
बस इसिलिये भाईसा चलो गांव मेरे यार.....

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रात को अब बयां करु कैसे,
तारे चमकते थे लाखों दियों जैसे...

कहते है इंसान सुकून की जगह चुनके तारों मे बदलते है,
शायद इसिलिये शहर छोड गांव के आसमां में इतने सारे तारे पणपते है...

बस अब और क्या बताऊं जाने का मक्सद मेरे यार,
उठाके बस्ता चलो गांव मेरे यार.....