आज देखा मैंने स्वप्न तुम्हारा ही सिर्फ, सारी रात चलती रही तुम ही तुम बंद पलको के नीचे भी सच....
स्वप्न जरूर था ये पर हकीकत लिए जिन्दगी सी,
पास भी थे तुम और कोसों दूर भी; मुस्कराते तो थे, पर बतियाते कहाँ!
संकटों की क्रीड़ा में जब न मिला कोई तो आये थे तुम पास, और उस पास आने के अहसास ने ही तुम्हें उतार दिया मेरे स्वप्नों में शायद....
प्रीत की बात ही चली और किस्मत की आदत के अनुसार खुल गई निद्रा मेरी.... ओह!
पर खुली आँखे झूठ बोलती कहाँ! अब स्वप्न नहीं, हकीकत बनाऊंगा तुम्हें, फिर आँखे बंद हों या खुली, रहोगी पास मेरे; सदा के लिए जिन्दगी बनकर जिन्दगी के जैसी ही..... सच।


