बातें तो हज़ार है ज़हन में मेरे,
मगर मैं खामोश ही अच्छा हूँ...
नफरत की आग लगाने वालों को,
प्यार की नसीहत दे दू,
तो जान की कीमत लग जाती है...
मजहब के नाम पे कोई रोटी सेके,
तो उसे धर्म-अधर्म का पाठ पढ़ाऊँ,
तो घर जलाने का हुक्म आता है...
नुक्कड़ पे कोई लड़की छेड़े,
उसे सन्मान की बातें समझाऊँ,
तो राखी के लिए हाथ खो दू...
बातें तो हज़ार है ज़हन में मेरे,
मगर मैं हर बार खामोश किया जाता हूँ,
मैं ज़िद्दी फिर बोल खड़ा होता हूँ...
जानता हूँ मेरी बातें आपकी ज़ुबाँ पर भी है,
इस ज़ुबाँ मजबूत करने आया हूँ,
अब मैं नया इतिहास लिखने आया हूँ...
किसी दिन मर भी गए अगर,
तो आपकी ज़ुबाँ में जिंदा रहना चाहता हूँ,
इस घुटन से अब आज़ाद होना चाहता हूँ...
बातें तो हज़ार हैं मेरे ज़हन में,
मगर क्या मैं खामोश ही अच्छा हूँ...??
~ फ़र्ज़ी ग़ालिब


