आपकी याद वक्त-बेवक्त बहुत आ हीं जाती हैं

कितना भी रोकूँ,आँखों से ये अश्क़ बह ही जाती है


सहेजा करता था आपकी बातें,लिखे क्विरी किस्से

जब उस पन्नों को देखूँ तो आँखें भर ही जाती है

कितना भी रोकूँ...


सोचा था मिलके आपसे कहूँगा अपनी दुविधा सारी

समय की कौन जाने,दिल में अरमां रह ही जाती है

कितना भी रोकूँ...


मन में आता है, हर हप्ते आपको कुछ लिखूं कुछ

किंतु अपनी सीमा समझ कलम रुक ही जाते हैं

कितना भी रोकूँ...


क्या कहूँ, कब कहूँ,कैसे कहूँ आपसे दिल की बात

ये जो घुटन सी है जेहन में है मेरे,वो रह ही जाती है

कितना भी रोकूँ...


सोचा था मिलके करेंगे गीले-शिकवे, प्यार की बातें

वजह जो भी हो,दिल में इक़ कसक रह ही जाती है

कितना भी रोकूँ...


देखिएगा ये दुःख की घड़ी कटेगी एक न एक दिन

पतझड़ कब तक ठहरेंगे,सावन तो आ ही जाती है

कितना भी रोकूँ...