देवी मैं आपकी पुण्य वेदी पर प्रसून बन स्वयं सर्वस्व समर्पित करता हूँ

हर रिश्तों से विवश व्यथित विह्वल मैं सहृदय स्वयं समर्पित करता हूँ।


इस धरा पर नर असंख्य मिले, क्या कभी किसी से हृदय मिले !

ये विदीर्ण हृदय वेदनाओं से कलुषित, लो अभी स्वयं समर्पित करता हूँ,

देवी मैं आपकी पुण्य वेदी पर...


क्या क्या बतलाऊँ, क्या क्या समझाऊं, खुद को कैसे बहलाऊँ भी

किससे किसका उपालंभ करूँ, तर्पित हेतु मैं स्वयं समर्पित करता हूँ

देवी मैं आपकी पुण्य वेदी पर...


बस एक हीं आशा औ अभिलाष, मेरे भी सौभाग्य खुलें अक्लेशी हों !

मैं व्यग्र, तृषित हूँ जग से, स्नेहकांक्षी हो अब स्वयं समर्पित करता हूँ,

देवी मैं आपकी पुण्य वेदी पर...