बहुत थक गया हूँ मैं..
कुछ समझ नहीं आता
कहाँ जाऊं,
किससे कहूँ, क्या कहूँ
कौन सुनेगा मेरी
बहुत थक गया हूँ...
कब कहूँ, कैसे कहूँ
क्या कहूँ,
कुछ समझ नहीं आता
क्यूँ सुनेगा कोई..
बहुत थक गया हूँ...
करनी मेरी, गम मेरे,
किस्से मेरे,
दर्द भी अपने
बेदर्द भी अपने
बहुत थक गया हूँ
आंखें मेरी,
अश्क़ भी मेरे
अश्कों में अहसास हमारे
करूँ भी क्या
बहुत थक गया हूँ
आँसू मेरे,
दामन गैरों के..!!
दामन महंगे हैं दुनियाँ में
मोल चुकाने पड़ते हैं
बहुत थक गया हूँ
अपनी श्रद्धा,
अपनी करुणा का,
मान मुझे, स्वाभिमान मुझे
जिंदा है ईमान अभी
बहुत थक गया हूँ


