आप , मैं और हमारी परछाइयाँ
बहुत कुछ कहती हैं हमारी उदासियाँ
क्यूँ सुनते नहीं इन खामोश लफ्जों को
एक बार ! सुनिए भी तो हमारी खामोशियाँ
बहुत कुछ कहती हैं...
खामोश होकर वक्त की बेकरारी को जानें
अनकही ! अनसुनी सी हैं हमारी बेकरारियाँ
बहुत कुछ कहती हैं...
आप और हम हैं बहुत करीब इस लम्हें
गौर कीजिए ! कुछ कहती हैं हमारी करीबियाँ
बहुत कुछ कहती हैं...
बेशक आज हैं हम मजबूर, न होंगे हरदम
काश ! आप भी समझते हमारी मजबूरियाँ
बहुत कुछ कहती हैं...
आपकी खामोशी से बेचैन हो जाते हैं अक्सर
क्या कहें आपसे ! बेजुबां सी है हमारी बेचैनियाँ
बहुत कुछ कहती हैं...


