श्रीराम अपनी प्रजा को असहमति का पूर्ण अधिकार देते हैं. वनगमन के दौरान गंगा'जी को जब पार करने की बात आई तो उन्होंने केवट से निहोरा किया कि मुझे उसपार(दूसरे किनारे) पहुंचा दो ;
"मागी नाव न केवटु आना।"
भावार्थ:-श्री राम ने केवट से नाव माँगी, पर वह लाता नहीं।
तो केवट ने निर्भयतापूर्वक साफ इंकार कर दिया और (बगल में खड़े लक्ष्मण की आंखें क्रोध से लाल देख कर) कहा :


