हम दोनो खुश थे
मैं किनारे के सबसे दूर का रेत था
और वो नदी के बीच की पानी जैसी
वो दूर थी मुझसे , बहुत दूर
पर हममें प्यार था, विश्वास था
और इसी विश्वास से , वो हर साल मुझसे मिलने आती
कभी लू के थपेड़े ने मुझे जलाया
तो गरमा हवाओ ने उसे सुखाया
और हममें दूरी बढ़ी,
पर ये दूरी भौतिक थी, आत्मिक नही।
और जैसे बारिश के एक बूंद से रेत ढिढुक जाता है
वैसे ही मैं सहम जाता था , उसकी एक छुअन से
जैसे तेज हवा के बहने से पानी में हलचल होता है
वैसे ही मैं भी सिहर जाता था, उसकी रुदन से।
पर अब वो हर साल नही आती..
कुछ लोग कहते है की तपन ज्यादा है
तो कुछ कहते है की शीतल ज्यादा है
पर मुझे पूरा विश्वास है की वो जो जरूर आएगी
वो कयामत की रात जरूर आएगी
जब सारा शहर डूब जायेगा
और हम दोनो हमेशा के लिए एक हो जायेंगे....

