ज़िंदगी को भी तो हमसे यूं गिला हो जैसे दर्द उसको भी मुहब्बत में  मिला हो जैसे।। देख  ले  मेरा भी  कोई  मुक़द्दर यहाँ पे यार के प्यार की अब कोई दुआ हो जैसे।। मर  गया  वो  पतंगा  भी  तो इश्क़ में ही अब मुहब्बत से ही होती हैं नफ़ा हो जैसे।। भूख़ी आत्मा को तो कुछ भी न दिखाई देता वास्ता  उसका  हैं  रोटी  से  ज़िया हो जैसे।। दर्द  को हमने ही अपने गले में बाँधा है ज़िंदगी  कोई  यहाँ  पे हैं  सज़ा हो जैसे।।