ज़िन्दगी की चादर फैलाई निकली अब चादर हरजाई सूनी आँख ख्वाब गायब रात भर यूँ नींद ना आई ज़िन्दगी यूँ फिसलती रही बन्द घड़ी कुछ ना बताई ज़िन्दगी का सफर करना है हर सफर में लिखी जुदाई क्या राजा, क्या रंक यहाँ वक्त ने यूँ औकात बताई मुसाफ़िर थे मुसाफ़िर रहे वक्त का पहिया ऐसे घुमाई