मृगनैनी सी,रूपवती सी, चाँद,सलोने से मुखड़े सी, वो सूंदर स्त्री,जवानी में ही, हो गयी वो विधवा! घाट किनारे,नदियों के पास, पता नही क्या सोच रही थी? वो विधवा! आते जाते निहार रही थी, देख स्त्रीयों को जल रही थी, मन ही मन कुचट रही थी, वो विधवा! किस्मत को भी कोष रही थी, दे भगवान् को दोष रही थी, वो विधवा! नही किसी से बोल रही थी, मन ही मन क्या सोच रही थी? वो विधवा! देख इतराता किसी का यौवन, बिंदी,लाली,कंगना,जुड़ा मन ही मन सुलग रही थी, वो विधवा! मैंने किसी का क्या बिगाड़ा? क्यू भगवान् ने मेरा सुहाग उजाड़ा? इसी उधेड़बुन में घिरी हुई थी, वो विधवा! विधवा होना कँहा सरल हैं? कठिन तपस्या में तपना हैं, अपनी इंद्रियों को हरना हैं, देख के सब-कुछ सहना हैं, हमेशा अनभिज्ञ सा रहना हैं, लोगो के ताने सहते रहना हैं, मुह से कुछ भीं ना कहना हैं, तो क्या फिर? एक विधवा का घर बस पायेगा! नया जीवन साथी मिल पायेगा! समाज क्या क्या बात बनायेगा? क्या अपनी सोच बदल पायेगा? इसी उधेड़बुन में घिरी हुई, घाट किनारे,नदियो के पास, क्या क्या सोच रही थी? वो विधवा!! -आकिब जावेद