वो ग़मो को यूं हवा देते हैं।।
हम ख़ुशी को ही भुला देते हैं।।
मेरे वो राज़ से भी है वाकिफ़।।
लोग मिलके ही दग़ा देते हैं।।
आरज़ू है दिलों को जोड़ने की।।
हम ग़मो को ही भुला देते हैं।।
मुख़्तसर सी है ये ख्वाईश मेरी।।
हम भी बिछड़ो को मिला देते हैं।।
ज़ात धर्मो की सियासत में ही।।
वो हमें खूब लड़ा देते हैं।।
ठोकरों में है नियामत उनकी।।
हम जिसे दिल से मिटा देते हैं।।
मोहब्बत में भी असर देखिये तो।।
हारे को जीत दिला देते हैं।।
देख कर उनको बहक जाता हूँ।।
नज़रो का ज़ाम पिला देते हैं।।
मौत के आने से तो लोग यहाँ।।
ज़िंदगी को भी भुला देते हैं।।
-आकिब जावेद


