मुश्किल से मिलते हैं रिस्ते
बाते वफ़ा की कंहा रह गयी है,
मुश्किल से मिलते है रिस्ते,
जिसमे रिस्ते रिभाने की कद्र रह गयी हैं।
है कुछ सलीका मिलने का उनसे,
दरफ्त दर दरफ्त परत खुलती रह गयी है,
हम कुछ समझते थे उन्हें,
वो कुछ और निकलते रह गये हैं।
मुश्किल से मिलते है रिस्ते
जिसमे रिस्ते रिभाने की कद्र रह गयी हैं।
है सहमत तो कर तू भी #तंज
फिर भी मुझे नही हैं कोई रंज।
है तेरे अंदर भी कई रंग,
देखा हैं मैंने तुझे बेतरतीब ढंग
चलो कोई बात नही यही तो है दुनिया के रंग।
मुश्किल से मिलते है वो रिस्ते
जिसमे रिस्ते रिभाने की कद्र रह गयी हैं।
अक्सर चोटी पर मकां वाले,सुनते नही गरीबो की,
बेहतर तो वो सड़क वाले,करते मदद सदा गरीबो की।
मुश्किल से मिलते है रिस्ते
जिसमे रिस्ते रिभाने की कद्र रह गयी हैं।


