दिल  तड़प  रहा  था यूं  दर्द अभी झेले थे ख्वाब की दहलीज पे तन्हा अभी अकेले थे सुनसान  गलियों  में  फ़कीरी से चलती रही ज़िन्दगी की तकलीफों के हरदम यहाँ रेले थे बेरुखी सी छायी है लबो-रुखसार में उनके यूं तोहमतें तमाम लगाके बोले झूठे वो झमेले थे बूढ़े  पेड़  की  छाल सा  सदियो  से ऐसे  रहे हम हर मौसम  गुज़ार  के तन्हा है अकेले थे इक  दिया  जलता  रहा  तुफानो  के  सीने में शम्मा हुई वहाँ ही रोशन जहाँ जहाँ अँधेले थे