वो मस्ती मे घर की अपनी बस्ती मे, इतराए,शर्माए,बलखाए फिर भी झलक ना दिखाए। वो दूर से ही देखकर इठलाए,महकाए,चहकाए उनकी ये अदा दॆखकर हमसे रहा ना जाए। यूंही चुपके-चुपके देखकर मनवा को जलाए, गर पास बुलाए तो वो झलक ना दिखाए। वो हमको सीधा-सादा जानकर ऐसे ही तडपाए ऐसे ही रिझाए, फिर भी हमको झलक ना दिखाए। वो चांद की चांदनी मे ऐसे रोशन हो जाए गर पूनम की रात मै देखू तो, मुझे झलक ना दिखाए। वो बसंत की हवा मे अपनी खुश्बू सी महकाए मेरे तन बदन मे एक सिहरन सी उठ जाए गर पास जाकर देखू तो मुझे झलक ना दिखाए।। -आकिब जावेद