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फ़िक्रों अदा ले आये हैं ग़ालिब के घराने से

छूट गया हाथ उसका एक उसके जाने से, टूट गयी उम्मीद सारी, उम्र के सिरहाने से। महबूब ने जो बुने हैं चाँद तारे मेरे दामन में अब सँवर के दिखेगा हुस्न मेरे दिखाने से। चन्द सांसों की भीड़,उसपे गम का मेला ये, ज़िन्दगी थकी कब है, हमको आज़माने से। नाउम्मीदी,बेवफ़ाई,दर्द आँशु गमो की खिर्जिया अब यही मिलेगा बस् दिल के इस खजाने से। अब तेरी याद में यूँ हम ऐसे दिन बिता
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