एक तारा दूसरे को निहारता रहा
चांदनी में अब कँहा पहचान पा रहा।
रोशनी वो चाँद की ज़मी रोशन कर रही
अब वो फलक में यूँही ठहरती रही।
सूरज की तपन को दूर से महसूस कर रहा
पास में आखिर वही उसे रोशन कर रहा।
इंसा की जिंदगी भी ऐसे रोशन हो रही
दूर से खुदा भी उसे रोशन कर रहा।
उठते हैं हाथ ऊपर ख़ुदा-ए-पाक के लिए
होती कबूल दुआएं जो मांगते रहे।
पल भर में कमी किसी की पूरी होती नही
जिंदगी भर जिसे दुआओ में हम मांगते रहे।
एक संमा जलाये हैं हम, इस जिंदगी में भी
बाद मरने के पता नही अब होता हैं क्या?
बुरा बन के हमे अब जीना नही
जिंदगी को अब खुशनुमा हम बनाते क्यू नही?
रख लो दुआओ में अब किसी का नाम
फलसफा जिंदगी का अब कर लो तमाम।
बुरा बन के जीने में नही कोई खैर
सच्चाई को जिंदगी के आईने में अब उतार।।
-आकिब जावेद