वो कड़कती धूप, वो घना कोहरा, वो घनघोर बारिश, और आयी बसंत बहार जिंदगी के सारे ऋतू तेरे अहसासात को समेटे तुझे पहलुओं में लपेटे चाँद को लिहाफ में समेटे लम्हा लम्हा बस यूं ही आहिस्ता आहिस्ता गुज़रती जा रही हैं और हम खड़े यूँ ही सामने से देखते ही रहे काश तुझको रोक कर, कुछ कह पाते तुझे समझा पाते, सुनो ना फिर मिलो ना बस एक बार हां वही फिर से मौसम की हरऋतु में, आहिस्ता आहिस्ता आहिस्ता आहिस्ता!! ®आकिब जावेद