कविता उम्मीद


उम्मीदों के पुल टूटे हैं अक्सर,

जब पता होता है

सब ठीक है।


भरोसे की नाव डूब गई,

जहाँ से किनारे

पहुँचा जा सकता था।


ख़ामोश शज़र को

इंतज़ार हो

किसी तूफ़ान का

जो ख़ामोशी पे मची

तबाही को शांत करेगा।


आत्मा मन की गहराई में

गोते लगा रही है।

महसूस कर रही है उम्मीदों को

हँसते हुए मानो कहती हो

उम्मीद किसी से काहे लगाना

जब उम्मीदों को टूट जाना है।


आकिब जावेद