जग में सबसे हम तो मिलते,

हँसते रहना इक़ आदत है।

दुख साथ रहे फिर भी चलते,

चलते रहना बस जीवन है।

मन जो अपना कर ले वश में,

सध जाय नहीं रुकता फिर है।

विपदा ख़ुद ही फिर है टलती,

डर जीत चुका विजयी वह है।

पथ के कुचले हर कंटक को,

भ्रम मुक्त रहे दृढ़ता पर है।

अब काज नहीं रुकता उसका, 

परमातम से उसकी लिव है।

अब नाज़ करे दुनिया उसपे, 

सबके दिल में रहता वह है।

सब वैर विरोध तजा मन से, 

चहुँओर उसे दिखता रब है।

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मैं आकिब जावेद यह घोषणा करता हूँ कि मेरे द्वारा प्रेषित रचना पूर्णतः मौलिक ,स्वरचित,अप्रकाशित और अप्रेषित है।कविशाला यदि भविष्य में इसे प्रकाशित करवाना चाहे तो इसमें मेरी पूर्ण स्वीकृति और सहमति है।

आकिब जावेद