हैं इबादत में मशग़ूल सब,
दो जहां को बनाया है रब।
चांद , तारे , नदी , आसमां,
पेड़ - पौधे है सज़्दे में सब।
ज़िंदगी बंदगी के लिए,
हर ख़ुशी आपने दी है रब।
उम्र भर मैं भी सज़दा करूँ,
बिगड़ी क़िस्मत बनाई है रब।
डाल दी क़ल्ब में मुस्तुफ़ा,
सब की परवाह करता है रब।
नूह , मूसा , सुलेमान का,
मुस्तुफ़ा का भी प्यारा है रब।
काम आकिब से ले लीजिए,
रब्बी हब्ली कहेगा या रब।
रब की वहदानियत लाजवाब,
वहदहू - ला - शरीका - लहू।
आकिब जावेद
