छेनी ,कुदाल,फावड़ा करके तैयार
मंडी सजी हुई है मज़दूरों की
अलग -अलग कद काठी के
जाति - पाती का भेद मिटाए
एक दिखते है ये मेहनतकश मज़दूर।
ऊंची - नीची जाति - धर्म से
नहीं हैं इनका नाता,
पेट की भूख मिटाने को
खाली पेट मंडी को निकल जाता।
बड़े - बड़े सेठों की गाड़ी को ताकते हैं,
टुकुर - टुकुर निहारती आँखें
हांड के मासों से बाहर आ जाती है।
सुबह से शाम करके काम
घर को अपने पालते हैं,
मज़दूरों को आभास नहीं है,
वो अपने देश को संभालते हैं।
आकिब जावेद


