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होली - मुक्तक


यूं तो मुझे रंग डाला मेरे यार नेकी है मुहब्बत भी बयां दिलदार ने

रूख़ी उसे रोटी खिला सकता नहींउफ़्फ़ उड़ाया होश इस बाज़ार ने।

— आकिब जावेद
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