
रदीफ़ - पर्दा
काफ़िया- अर
1212 1122 1212 22
पड़ा हुआ था ये कबसे सनम इधर पर्दा
उड़ा गयी है हवा आज ये किधर पर्दा।
तेरा मयार नमूदार हो न जाये कहीं
बना ले अपनी हया के लिये नज़र पर्दा।
है इब्तिदा ये मुहब्बत की फूल की तरहा
छिपा-छिपा सा ही रहता है अब इधर पर्दा
क़रार आता कहाँ है बिना उन्हें देखे
शरीफ इतना हूँ लगता है मोतबर पर्दा।
उतार कर जरा अपना
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