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ग़ज़ल - उड़ा गयी है हवा आज ये किधर पर्दा

रदीफ़ - पर्दा

काफ़िया- अर

1212 1122 1212 22


पड़ा हुआ था ये कबसे सनम इधर पर्दा

उड़ा गयी है हवा आज ये किधर पर्दा।


तेरा मयार नमूदार हो न जाये कहीं

बना ले अपनी हया के लिये नज़र पर्दा।


है इब्तिदा ये मुहब्बत की फूल की तरहा 

छिपा-छिपा सा ही रहता है अब इधर पर्दा


क़रार आता कहाँ है बिना उन्हें देखे 

शरीफ इतना हूँ लगता है मोतबर पर्दा।


उतार कर जरा अपना

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