तनाव जीवन में,

जीवन को लीलने आता है।

स्तब्ध हो जाते हैं

मनुष्य

तनाव को झेलते - झेलते।


सामाजिक,आर्थिक रूप से सम्पन्न

उनको तनाव दूसरे स्तर का होता है

गरीब, मज़दूरों को,

दो जून की रोटी का तनाव सताता है।


पेट की आग झेलते - झेलते

ठंडे हो जाते हैं नयन,

लेकिन जठराग्नि बेचैन रहती है,

तनाव बना रहता है

दो जून की रोटी के खातिर।



आकिब जावेद