जो कभी था मेरा वो बिका मिल गया

ज़िंदगी का अज़ब ये सिला मिल गया

वक़्त रहते कभी जो न मेरा हुआ

दर पे वो भी किसी के खड़ा मिल गया

नज़रे तेरी मुझे सब बयाँ कर रही

नाम का तेरे इक क़ाफ़िया मिल गया

बंद हाथों में उसके था क्या क्या यहाँ

सोचते - सोचते कुछ नया मिल गया

हम चले है सफर में अकेले तो क्या

ढूँढते - ढूँढते यूँ  ख़ुदा मिल गया

-आकिब जावेद