बारिश की बूंदें धरती में गिरने से पहले
यात्रा करती है कई मील दूर तक
उसकी इस यात्रा में बिछड़ते है
ऐसे साथी जो देते हैं वचन
धरती तक साथ निभाने का
लेकिन बिछड़ना तो तय है।
क्योंकि
बूंदें स्वयं से विलग होकर
शेष रह जाती है कण बराबर
अंत में
छोड़ना होता है वैरागी संसार
मिलना ही होता है दूसरे में
स्वयं से बिछड़कर।
आकिब जावेद
