रास्ते में निकलता हुज़ूम,

छोटे - छोटे बच्चें,युवा, बच्चें, बुज़ुर्ग

प्रतिदिन लाखों - करोड़ों की भीड़

किसी को रोटी की तलाश

तो कोई दुनिया की सैर में है।

जान की जोख़िम बनी हुई है

यात्राएं करने में

कभी ट्रेन,बस,हवाई यात्राओं में,

सभी में दुर्घटनाएं प्रतिदिन होती है

अनियंत्रित भीड़ ने

शायद

स्वयं का मूल्यांकन नहीं किया है

कार्यपालिकाएं,व्यवस्थापिकाएं

मानो मौन दर्शक बन चुकी है

नियम को ताक में रख दिया गया है

लगता है नियमों का आचार बना कर

ज़ार में रख दिया है इस भीड़ ने

कोई भी सुनने को तैयार नहीं है।

मस्तिष्क को शून्य में सवार कर चुके है

घर से निकल चुकी है भीड़

यात्राएं करने को

कभी किसी तीर्थ - कभी किसी धाम

दरगाहों में अमूमन दिख जाएगा हुज़ूम।

यात्राएं न करके

ये व्यवस्थाएं बिगाड़ने में जुटी है भीड़।


आकिब जावेद