कौतूहल चारों तरफ फैला हुआ है,
रमणीक दृश्य के साथ -साथ -
अंजान वीभत्स रूप भी तो है।
तो कहीं अनसुना सा शोर मचा है,
पूरे ब्रह्माण्ड में गूंज रही है आवाज़,
वो आवाज़ है कमज़ोर - असहाय,
कृषक, मज़दूर,छात्र,दलित - आदिवासी,मजलूमों की।
कभी - कभी दबा दी जाती है आवाज़,
उभर कर आती आवाज़ें,
दब जाती है बंदूक के शोर में।
लेकिन नहीं दब सकता है संविधान,
चाहे गर्त में चली जाए पत्रकारिता,
समाज का सिस्टम।
लेकिन
जो आवाज़ बुलंद है,
उसे जेल के कैदखाने भी कैद नही कर सकते।
गांधी की विचारधारा,आंबेडकर का संविधान,
जिंदा रखता है आवाज़।
पाताल से लेकर समूचे ब्रह्मांड में गूंजेगी आवाज़।
आकिब जावेद


