सब छतों पर खड़े थे, दीदार चांद के लिए

सब इंतजार में थे अपने करवा के लिए

मैं भी था छत पर खड़ा पता नहीं क्यों?

शायद इंतजार कर रहा था चांद निकलने का


चांद ने भी सुनी सबकी ,दर्श दे दिए

आया छटा बिखेरते, अर्श में लिए

खूब दीदार किए सबने, मैं भी निहारता रहा

खूबसरत इतना कि मैं दसों बार समा गया


यूं ही नहीं होती तारीफ तेरी, आज मैं ये जान गया

तुझमें कुछ तो है जिसने जहां अपना बना लिया

सबने आर- पार छन्नी से जी भर के दीदार किया

ऐसा लग रहा था मानो सबको खुश कर दिया


मैं टकटकी लगाए तुझको निहारता रहा

खुले नैन छद्म स्वप्न मैं क्यों देखता रहा?

सब छतों से निकल गए...........

मैं बेवजह खड़ा रहा .........


अखिलेश अंथवाल, उत्तराखंड