गहरी रात और सन्नाटे में शोर बरपा है
कोई तो है जो साथ मेरे आज तड़पा है
बदन सुन्न है न बोलता है न सुनता है
कोई तो ज़ख़्म है जो गहरे अंदर पलता है
रुक कर देखता अपने कदमों को मैं
भला इनके आगे और कौन चलता है
आहट होती है और कोई आता भी नहीं
कौन है जिसका निशाँ दहलीज़ पर रोज़ मिलता है
