आसमान मे परिंदो का शोर बाकी है
उड़ान मे अभी दौड़ बाकी है
सुकून भरी आँखों से देखता मैं उन्हें
सजा तो काट ली बस मौत बाकी है


सफर मे कदम कहाँ कहाँ चलते क्या पता
मुसाफ़िर कौन कौन है मुझे क्या पता
ख़त मे लिखा था निगाह है महबूब का
यानी दूकान जल गया बस मकान बाकी है


हवा भी है सावन की है इन वादियों मे
गूंज भी कमाल की है पहाड़ियों मे
फिजाओ की रुत मे भी जवानी है
अहसास होता है इश्क़ हो गया पैगाम बाकी है


जीने दे ज़िन्दगी थोड़ी जान बाकी है