राहें लग तो रही थीं आसान, लेकिन जाना तो बहुत दूर तक था।

कुछ तैयारी से जैसे तैसे कदम बढ़ाया मंजिल की तरफ, आगे निकल तो आए लेकिन कमीज थी किसी और की।

अंधेरे मे उसी को अपनी मान कर हम आगे बढ़ गए, लेकिन कमीज तो थी पुराने अंधे कारीगर के हाथों से बनी बिल्कुल वैसी, जैसी वो चाहता था।

मानो दूसरा कदम ही था मंजिल की ओर पड़ने लगे ठंड के थपेड़े, मेरी कमीज होती तो शायद सह लेती लेकिन कमीज थी किसी और की ।

अब आगे बढ़ते जाना भी था मुश्किल, और पीछे मुड़ के जाते भी तो कहाँ लगता था मानो पीछे का रास्ता तो कभी था भी नहीं ।

बस फिर क्या था हसरतों ने वहीं दम तोड़ दिया क्योंकि कमीज थी किसी और की।

मेरी कमीज थी छोटी लेकिन यकीन था उस पर की इस कमीज से ज्यादा टिक जाती क्योंकि बनी थी वो मेरे भरोसे और मेरे तजुर्बे की डोर से

लेकिन मेरे ही अंधेरे ने मेरे सफ़र का गला घोट दिया क्योंकि कमीज थी किसी और की ।

अगर बच भी जाते ठंड के थपेड़ों से पा भी लेते मंजिल हो जाती हसरत पूरी फिर भी हार मेरी ही होती

क्योंकि जीतता तो कोई और क्योंकि कमीज थी किसी और की।