ये उत्तरायण भी देखो हमको

कितना कुछ सिखाता हैं

कच्ची डोरी जैसा रिस्ता

पल में टूट बिखर जाता हैं


मन फिर से बच्चा बनकर

पतंग सा उड़ना चाहता हैं

रंग बिरंगे इस आसमां में

पंछी सा चहकना चाहता हैं


सुकूँ भरा हैं कितना इसमें

कितना मन को भाता हैं

सर्द हवाओं संग दिन कितना

जोश में बीत जाता हैं


किसी का पतंग ऊँचा हैं बहुत

किसी का उड़ ना पाता हैं

जीवन की सच्चाई को देखो

ये किस ढंग से दिखाता हैं


आसमां की ओर तो देखो

क्या रंग उभरकर आता हैं

इन प्यार की पतंगों से

दिल इसका भी रंग जाता हैं


तेरी यादों की डोरी से

मन मेरा भी उड़ना चाहता हैं

उस पतंग की भांति देखो

नभ को छूना चाहता हैं


~आकाश यादव