इन सर्दी की रातों में
तारों का ये नूर बहुत हैं
रंज फ़क़त इस बात का हैं
वो चाँद अब भी दूर बहुत हैं
कबतक चुपके चुपके रहे यूँ
कबतक रूठें रूठें रहे यूँ
हम भी कैसे बात करे अब
हममें भी तो गुरूर बहुत हैं
जी चाहता हैं तकता रहूँ
मैं क्या उसको बयां करूँ
वो क़ातिलाना मुस्कुराहटे
और आँखों में सुरूर बहुत हैं
पलकों की सलाखों में हैं
वो बस चंद ख्वाबों में हैं
जाने कौन गली रोशन हैं
वो चाँद अब भी दूर बहुत हैं
~आकाश यादव

