अश्रुधारा बह उठती है
संयम बन्ध टूट जाते है
जाने कैसे , चुनित असुर
ये द्रवित-दृश्य सह जाते है
आरोप ये भी नही है कि
तुमसे न पुरजोर हुआ
पर कहीं कसर तो रह गयी
जहाँ सुरमा कमज़ोर हुआ
संवेदन से , ऊपरी मन से
धन से , घाव नही भरते
अगर समय पर सौदा होता
इतने लोग नही मरते


