ये काव्य शायद छूटेगा,
बीड़ा दुःख का टूटेगा
हृदय में गहरा रोष होगा!
सब तुम्हारा दोष होगा।
विश्व प्रेम में अक्षर ढूंढ़ता हैं;
और वियोग में कविता गूँधता है
पर मैं तो प्रेम सह पाता था,
श्रृंगार तुम्हारा कह पाता था।
अब न कविता, न रस होगा,
शब्दों में टस न मस होगा
भाव शून्य बोली होगी
न वचन बद्ध मौली होंगी।
आँसू भी देख न पाओगे
आँखे भी कहा मिलाओगे
दुनिया में न गान होगा
तुम्हारा वही सम्मान होगा
मुझमें भी वही भावनाएँ होंगी
पूरी सभी सम्भावनाएँ होंगी
कविताएँ तो लिखी जाएँगी
बस तुम तक पहुँच न पाऐगी
पर एक दिन तुम खत पाओगे
पृष्ठों में अमर जब हो जाओगे
ये विश्व नाम पुकारेगा
तुमको भी स्वीकारेगा
ये श्रृंगार वही होगा उसमें
सिर्फ प्रेम, नहीं धोखा उसमे
जब पृष्ठ उलट कर देखोगे
काव्य छूटा हुआ होगा
हृदय से देखना तुम हृदय
हृदय टुटा हुआ होगा|
गुप्ता@र्श
