ओढ़े रहता है लिहाफ वो रातों को
आती नहीं निवास मन की बातों को,
खींचता है हर एक कोना, और समेटता है खुद को
पर पूर्वा लगती रहती है उसके जज्बातों को।
झुंझलाई आँखों को जब पलकों का पहरा देता है।
होठों को भी मौन करा, कानों को बहरा देता है
चैन आने से पहले जाने के स्वप्न पुराने
आहत मन के घावों को गहरा देता है।
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