आसान है आगजनी
भीड़ बनकर
जला देना देश के विकास को
फिर आसान है
सुबह की चाय से रात की शराब तक
कोस लेना विकास को
पर कितना आसान है
किसी के लेना प्राण
और कितना आसान है
उसके सही-गलत का ज्ञान
प्राण किसी का प्राण होते है
नहीं सरकारों की बपौती
नहीं कर सकते वो इंतज़ार
सालों तक आने की आसा के
मंचो के किसी झांसे के
