धर्म ने स्वयं थामे भाले, 

एक धर्म स्वयं संग चले बढ़े, 

बल वीर सजाए युद्ध के पालें 

सेना संग युद्ध आयुध वीर बढ़े। 


सुदर्शन गांडीव में झलके, 

पांचजन्य सर्वस्व गूंज रहा 

आकर भानू रोज सवेरे 

आर्यवृत्त का दडूब  रहा।  


गिरे गंगा पूत धरातल 

राधेय भी सब हार गया,

लड़ा धनञ्जय लाल अकेला 

चीर के सब के तार गया। 


रणचंडी ले रक्त का प्याला, 

नींदो से पुरानी जाग  रही। 

जहा नाथ की आँखे घूमें 

पग-पग उस पथ भाग रही। 


कुरु की धरती पर रक्त गिरा, 

या अश्रु मोहक लोचन का। 

योद्धाओं के बँध खुले या 

नेत्र खुला त्रिलोचन का।