अरुण देव की किरणे लाल 

रंग दे मेरा मस्तक भाल 

और रंग सुनहरा 

आँखों में मेरी तर जाए, 

मंद पवन के झोकों में 

जो लेकर नमियां औंस के 

उन बूंदो की 

जो खिला रहे थे पत्ते 

अंधकार मयी उन रातों में 

मुझको छू ले 

रंग फूलो के श्वेत गुलाबी 

सब मुझमें भर जाए। 

और तालाबों में बहते 

जल का रंग नीला 

करके मेरे मन को गीला 

गहरी मन की पीड़ाओं को हर जाए

और यदि मैं कवि हूँ 

प्रकृति मेरा प्रथम प्रेम हो

प्रेम जता कर एक दूजे को 

हम आँख मिचोली कर जाए 

हम ऐसी होली कर जाए।