लगा है तारो का मेला,

है पर चाँद अकेला!

झेल रहा है हो विरक्त

जीवन की सच्चाई...

रोया-रोया सा लगता है

देख के अपनी पृथ्वी से ऊंचाई|

रो-रो कर सुख गया है

उसकी आंखो का पानी;

दिखती है बस केवल

सदियों पुरानी निशानी...

अकुलाता है?

सागर को पास बुलाता है ...

तारे, सारे के सारे

जो पृथ्वी को उसके पास दिखते है

है अनजान! कि उसके पास नहीं वो टिकते है

खुशियों का धीमा प्रकाश

जो पृथ्वी को दिखलाता है

झूठा है सब,

सूरज से लाता है|

लगता है मस्ती में झूम रहा है!

अकेला कब से घूम रहा है

चिढ़ता कभी आ जाता

पाने को ध्यान,

सूरज के आगे

अपना अस्तित्व दिखाता है|

~Guptaarsh