छज्जों -छज्जों का प्यार!
बेसुध सी उड़ जाती है वो करने चाँद दीदार
छज्जों पर होते है अक्सर पहले पहले प्यार।
अल्हड सा वो घर का लड़का फिरता है आवारा
सबकी डांटे खाता फिरता, फिर भी उसका प्यारा;
सारे काजों का ले लेती उसके सर से भार
छज्जों पर होते है अक्सर पहले पहले प्यार।
पतंगों में आने की आवाजें सुन लेती है
सुखी कैरी रोज बताकर ताजे ही चुन लेती है
सौ आँखों के बीच ही होती छोटी आँखे चार
छज्जों पर होते है अक्सर पहले पहले प्यार।
बाजारों में जब भी जाता साइकिल पे दीवाना
एक मंद आवाज है कहती पिली चूड़ी लाना
चाँद रात में होती वो जैसे बसंत तैयार
छज्जों पर होते है अक्सर पहले पहले प्यार।
जी भर डर कर रहती है कि घर को वो न आने लगे
बड़पन में बहकर बाते मेरी न गाने लगे,
दूर से ही अच्छा लगता उसकी बातो का त्यौहार
छज्जों पर होते है अक्सर पहले पहले प्यार।


