तरन्नुम मेरी जब भी कभी मुझपे वारी जाती हैं
कोई सैलाब हैं जो मुझमे कहीं गुज़री जाती हैं।
आगोश की फ़िकर न कीजे कि अभी जिन्दा हूँ मैं
इन्ही आगोश पर तो कितने फतवे जारी जाती हैं।
हर पैकेज में हो कई खजाने जैसे
इन्ही खजानों से मत इंसानो की मारी जाती हैं।
इल्म इंसानियत का अब गिर चूका हैं बहुत नीचे
और हर तफर तरक्की की सवारी जाती हैं।
बहुत दिनों तक मुझमे वो बेपर्दा रहा आकाश
फिर जैसे ही वो रात आई रुठ कर गुज़री जाती हैं।।
#आकाशा


