मेरी बेदिली , अगर तुझे भुलाने की इंतहा हैं

यकीं मान! ये मेरे टूट जाने की इंतहा हैं।

धूल फांकती उस ताख की किताबो से मुस्कुराता वो गुलाब

ये उस गुलाब के मुस्कुराने की इंतहा हैं।

शाम ऐ चराग जो तेरे हुस्न से रौशन हुआ करती हैं

तेरा ये नूर उन चरागों के जल जाने की इंतहा हैं।

वो लम्हें,वो बातें,वो यादें और फिर ये आँसु

ये मेरे ग़ुस्ताखियों की इंतहा हैं।

#आकाशा।।