तप कर सोना बनूं

या जल कर प्रकाश हो जाऊं ,

तुम मथ दो तो घृत बन जाऊं

पंख हों तो आकाश बन जाऊं ।


संभावनाएं अपार हैं

किंतु कोई परिणीति तो हो ,

किसे चाहिए वह जिसके अपने पैर ,

अपनी जुबान हो ।


मैं कुछ भी बन जाऊं

बड़ा घर नहीं बन सकता ,

क्योंकि मुझे विरासत ही नहीं मिली

कुछ भी बनने से बड़ा घर नहीं बन जाता ।


पिता के बिना पुत्र नही होता

कोई पहचान हो तो पहचान बनती है,

संसार की रीति ही ऐसी रही है

दरबार हो तो सभा सजती है।


डा सत्येन्द्र पाल सिंह