आपका सम्मान
आप जब भी मिलेंगे
पहचानूंगा नही
किनारे हट जाऊंगा ,
और आपको
शान से गुजर जाने दूंगा ।
मैं अपनी बैसाखियां
चादर से ढक लूंगा ,
अपने घावों पर
अबीर गुलाल छिड़क लूंगा ,
ताकि आपका सम्मान बना रहे।
मैं अपने सारे अहसास
कंठ कर लूंगा ,
अपने मस्तक पर
आपका जयगान लिख लूंगा ,
ताकि चतुर्दिग जो भ्रम है
वह बना रहे।
ये सब कुछ कर
ग्लानि तो होगी न,
अपने अंदर रह नही पाऊंगा ,
बाहर आकर कोई खोह तलाशूंगा
जहां बिना चीखे
तब तक रो सकूं,
जब तक आपका
जलसा खत्म न हो जाये।
डा सत्येन्द्र पाल सिंह
लखनऊ

